विपक्ष के इशारे से हो रहे “किसान आन्दोलन” में अब नही बची है जान

जहां कभी भीड़ हुआ करती थी, वहां अब सन्नाटा पसरा है, इक्के दुक्के लोग घूमते फिरते दिख जाते हैं. दिल्ली में हुई हिंसा के बाद कई किसान संगठनों ने किसान आंदोलन से अपना समर्थन वापस ले लिया था. उसके बाद राकेश टिकैत ने आंसुओं से राजनीति करते हुए आंदोलन को जाति के आंदोलन में बदलने की कोशिश की.

कुछ देर के लिए तो टिकैत का यह पैंतरा काम कर गया, लेकिन अब महापंचायत के मंचों पर बैठने के लिए भी लोग जुटाना मुश्किल हो रहा है. राकेश टिकैत कहते हैं कि आंदोलन फेल हुआ तो किसान फेल हो जाएगा.

वहीं दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी को हराने की बात कहकर, विपक्ष के नेताओं के लिए प्रचार करके टिकैत किसान आंदोलन के नाम पर वामपंथियों और विपक्ष की मांग को आगे बढ़ा रहे हैं. किसान आंदोलन अब किसानों का न रहकर सिर्फ वामपंथियों का आंदोलन रह गया है. वही आज कल वामपंथी विचारधारा से जुड़े लोग ही टिकैत के साथ नजर आ रहे हैं.

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